जाने क्यूं
अब शर्म से,
चेहरे गुलाब नहीं होते !!
जाने क्यूं
अब मस्त मौला मिज़ाज़ नहीं होते !!
पहले बता दिया करते थे,
दिल की बातें..
जाने क्यूं
अब चेहरे,
खुली किताब नही होते !!
सुना है
बिन कहे
दिल की बात
समझ लेते थे..
गले लगते ही
दोस्त हालात
समझ लेते थे !!
तब ना फेस बुक
ना स्मार्ट मोबाइल था..
ना फेसबुक
ना ट्विटर अकाउंट था...
एक चिट्ठी से ही
दिलों के ज़ज़्बात
समझ लेते थे !!
सोचता हूं
हम कहां से कहां आ गये,
प्रेक्टीकली सोचते सोचते
भावनाओं को खा गये !!
अब भाई भाई से
समस्या का समाधान
कहां पूछता है !!
अब बेटा बाप से
उलझनों का निदान
कहां पूछता है !!
बेटी नहीं पूछती
मां से गृहस्थी के सलीके !!
अब कौन गुरु के
चरणों में बैठकर
ज्ञान की परिभाषा सीखे !!
परियों की बातें
अब किसे भाती हैं !!
अपनों की याद
अब किसे रुलाती है !!
अब कौन
गरीब को सखा बताता है !!
अब कहां
कृष्ण सुदामा को गले लगाता है !!
ज़िन्दगी में
हम प्रेक्टिकल हो गये हैं !!
मशीन बन गये हैं सब
इंसान जाने कहां खो गये हैं..?
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Fido.
Good one. Everything's true, except this one:
बेटी नहीं पूछती
मां से गृहस्थी के सलीके !!
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