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फ़िल्मी नहμ //-->

Not a film but a true story -->फ़िल्मी नहμ




फ़िल्मी नहीं, सच्ची कहानी...:up:
http://wscdn.bbc.co.uk/worldservice/assets/images/2010/07/26/100726081643_tambi_workplace_226x283_nocredit.jpg[/img]
असल जिंदगी की कहानी पर तो कई फ़िल्में बनती हैं लेकिन फ़िल्मी सी लगने वाली कोई कहानी अगर ज़िंदगी में सच हो जाए तो क्या अनुभव होगा.

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में रहने वाले 50 वर्षीय राजेंद्र कुमार अय्यर ऊर्फ तंबी की जिंदगी किसी पटकथा से कम नहीं. 47 साल पुरानी एक धुंधली सी याद ने उन्हें किस तरह अपनों से जोड़ा, पेश है ये कहानी खुद ‘तंबी’ की ज़ुबानी.

"सच कहूं तो मुझे तो याद भी नहीं है लेकिन पिता ने बताया था कि जब मैं तीन साल का था तभी मेरे माता-पिता के बीच झगड़ा हुआ और मेरे पिता मुझे लेकर घर से निकल पड़े.

बचपन की याद

जब मैं तीन साल का था तभी मेरे माता-पिता के बीच झगड़ा हुआ और मेरे पिता मुझे लेकर घर से निकल पड़े.

राजेन्द्र कुमार अय्यर उर्फ 'तंबी'
http://wscdn.bbc.co.uk/worldservice/assets/images/2010/07/28/100728015302_tambi_226x283_nocredit.jpg" border="0" alt="http://wscdn.bbc.co.uk/worldservice/assets/images/2010/07/28/100728015302_tambi_226x283_nocredit.jpg" />

बचपन की मेरी पहली याद यही है कि मेरे पिता बिलासपुर शहर के एक छोटे से होटल में बरतन धो रहे हैं और मैं वहीं भट्टी के पास बैठा खेल रहा हूं. पिता दिन भर होटल में काम करते और रात में हम दोनों बाप-बेटे वहीं होटल के बरामदे में सो जाते.

पांच साल का होते-होते मैंने होटल में छोटे-छोटे काम करने शुरु कर दिये थे. तेज धार वाले चाकू से बारीक प्याज काटना तो मेरे लिये बायें हाथ का खेल था. होटल में मुझे सभी तंबी पुकारते थे. तंबी यानी ‘छोटा भाई’.

एक दिन मुझे इस तरह काम करते देख एक ग्राहक ने मेरे मालिक को टोका और कहा कि बच्चे को पढ़ने-लिखने दो. ग्राहक ने मेरे लिये दो ड्रेस सिलवाये और फिर मेरा पास के ही स्कूल में दाख़िला हो गया. स्कूल में मेरा नाम था राजेंद्र कुमार अय्यर.

मां का सपना

स्कूल मेरे लिये एक नया संसार था. नए दोस्त, नए लोग और पढ़ाई. हालांकि इससे मेरे जीवन में कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ा. सुबह सात से 11 तक स्कूल और फिर स्कूल से लौटते ही होटल का काम.

एक दिन पिता का होटल के मालिक से विवाद हो गया और उन्होंने दूसरी जगह काम करना शुरु कर दिया. लेकिन मैं वहीं बना रहा. परिस्थितियां ऐसी बनीं कि तीसरी कक्षा तक पढ़ाई के बाद स्कूल भी छूट गया और मैं एक बार फिर से बन गया केवल तंबी. मैं पूरी तरह से होटल के काम में ही रम गया.

एकाध बार मन में मां के बारे सवाल उठा. पिताजी से पूछा तो उन्होंने साफ कह दिया- ‘तुम्हारी मां तो कब की मर गई बेटा.

http://wscdn.bbc.co.uk/worldservice/assets/images/2010/07/28/100728014620_tambi_226x170_nocredit.jpg" border="0" alt="http://wscdn.bbc.co.uk/worldservice/assets/images/2010/07/28/100728014620_tambi_226x170_nocredit.jpg" />

अपनी पत्नी और बेटियों के साथ तंबी


तंबी
आठ साल की उम्र तक मैंने कई हुनर सीख लिए थे. मुझे पता था कि पकौड़ों और जलेबी से भरी 6-7 प्लेटों को किस तरह संभालना है. मुझे महीने के 15 रुपये भी मिलने शुरु हो गए थे. 14 साल का होते-होते होटल के मालिक ने मुझे होटल के रखरखाव से जुड़ा काम भी देना शुरु कर दिया. मेरे मालिक के पास लॉज थे, भोजनालय था और चाय-नाश्ता परोसने वाला ‘संतोष भुवन’. मैंने लगभग तीनों जगहों में मालिक का हाथ बंटाना शुरु कर दिया.

इस बीच पिताजी मेरे पास आते-जाते रहते थे. पिताजी के अलावा अपना कोई था भी कहां! भाई-बहन तो थे नहीं. एकाध बार मन में मां के बारे सवाल उठा. पिताजी से पूछा तो उन्होंने साफ कह दिया- ‘तुम्हारी मां तो कब की मर गई बेटा’.

ज़िंदगी होटल की रफ़्तार से ही चलती रही. दिन भर के काम के बाद जब रात को सोता तो कई बार सपने में लगता जैसे मेरी मां मुझे आवाज़ दे रही है, लेकिन ये शायद सिर्फ सपना ही था...."

असल जिंदगी की कहानी पर तो अकसर फिल्में बनती हैं लेकिन फिल्मी सी लगने वाली कोई कहानी अगर जिंदगी में सच हो जाए तो क्या अनुभव होगा.
http://wscdn.bbc.co.uk/worldservice/assets/images/2010/07/29/100729081508_tambi_with_his_wife_226x170_nocredit.jpg" border="0" alt="http://wscdn.bbc.co.uk/worldservice/assets/images/2010/07/29/100729081508_tambi_with_his_wife_226x170_nocredit.jpg" />


छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में रहने वाले 50 वर्षीय राजेंद्र कुमार अय्यर ऊर्फ तंबी की जिंदगी किसी पटकथा से कम नहीं. 47 साल पुरानी एक धुंधली सी याद ने उन्हें किस तरह अपनों से जोड़ा, ‘तंबी’ की इस कहानी को खुद उनकी ज़ुबानी हम आप तक पहुंचा रहे हैं.

क्लिक करें इससे पहले का विवरण पढ़ने के लिए क्लिक करें

(इस कहानी में अब तक आपने पढ़ा कि तीन साल की उम्र में तंबी के माता-पिता के बीच झगड़ा हुआ, और पिता उन्हें लेकर घर से निकल पड़े. अपने पिता के साथ मिलकर उन्होंने एक होटल में काम करना शुरु कर दिया. मां के बारे में पूछने पर उनसे कहा गया कि वो मर गई लेकिन तंबी अकसर उन्हें याद करते थे. अब आगे...)

'' मध्यप्रदेश के बिलासपुर शहर में रहते और काम करते मुझे 20 साल हो गए थे.

मैं कोई 25 साल का रहा होऊँगा. एक दिन पिताजी आए और उन्होंने अपने गांव की बात छेड़ी. ये 1985-86 के आसपास की बात है. तमिलनाडु के वृद्धाचलम के पास हमारा गांव था ‘तोंडंगकूर्ची’. बिलासपुर से कोई दो हज़ार किलोमीटर दूर.

एक दिन मैंने चाचा से अकेले में पूछा था- “ चाचा, मेरी मां कैसे मरी थी ” चाचा ने कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दिया. गांव में कुछ और लोगों से मैंने मां के बारे में जानना चाहा लेकिन कहीं कोई उत्तर नहीं मिला

तंबी
हम दोनों ने थोड़े से पैसे जमा किए और अपने गांव के लिये चल पड़े. पहले ट्रेन की लंबी यात्रा करके वृद्धाचलम. फिर वहां से वेपुर और वहां से बस पकड़ कर अपने गांव तोंडंगकूर्ची.

रिश्ते अनजाने

गांव में हम चाचा के घर रुके. पिता तो गांव में मगन हो गए लेकिन सच कहूं तो मेरे लिए रिश्ते के नाम पर कोई खास आकर्षण नहीं था. चाचा और चचेरे भाइयों के साथ रिश्ते की आत्मीयता तो थी लेकिन यह ये संबंध औपचारिक से ही थे. हो सकता है, पहली मुलाकात के कारण ऐसा हो. मैं पहली बार घर के माहौल से रूबरु हो रहा था.

कोई दस दिन तक वहां रहने के बाद हम दोनों बिलासपुर लौट आए. पिता खुश थे कि मैंने अपना गांव देख लिया और इतने सालों बाद उनकी भी अपने रिश्तेदारों से मुलाकात हो गई, लेकिन मेरा मन उदास था.

गांव में रहते हुये एक दिन मैंने चाचा से अकेले में पूछा था- “चाचा, मेरी मां कैसे मरी थी” चाचा ने कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दिया. गांव में कुछ और लोगों से मैंने मां के बारे में जानना चाहा लेकिन कहीं कोई उत्तर नहीं मिला.


अपनी पत्नी और बेटियों के साथ तंबी.
33 साल की उम्र में मेरी शादी हुई. इसके बाद दो बेटियां हुईं और मैं अपनी दुनिया में रम गया.

पिता की गांव वापसी

इस बीच पिताजी बीमार पड़ गए. उनका इलाज चलता रहा लेकिन एक दिन उन्होंने इच्छा जताई- “ मैं इस परदेस में रहकर नहीं मरना चाहता. मुझे गांव जाने दो.”

मेरे मना करने के बाद भी वो एक दिन मेरी जान-पहचान वाले से कुछ पैसे लेकर अकेले गांव चले गए. मेरे पास कोई चारा नहीं था. चाचा और चचेरे भाइयों को चिट्ठियां लिखी कि उनका ध्यान रखना. जितना संभव था, हर महीने उनके इलाज और दूसरे खर्चे के लिये मैंने मनीऑर्डर भेजना भी जारी रखा.

2007 में गांव से खबर आई कि पिताजी बहुत बीमार हैं, जल्दी आओ. भागा-भागा गांव पहुंचा. पिता बिस्तर पर थे. तय किया कि इन्हें बिलासपुर ले जाऊँगा. लेकिन इस बीच जो कुछ घटा, उसने मेरी दुनिया बदल दी.

चचेरे भाई की पत्नी से एक दिन दोपहर में यूं ही रिश्ते-नाते और मां को लेकर बात चली. भाभी से बातचीत में ही पता चला कि मेरी मां पिताजी से झगड़े के बाद अपने मायके चली गई थी. फिर उनका क्या हुआ, इसकी कोई खबर नहीं मिली. 48 साल की उम्र में एक बार फिर मेरे मन में मां के बारे में जानने की इच्छा जगी..."

"मैंने भाभी को इस बात के लिये तैयार किया कि हम दोनों मां के मायके जा कर इस बारे में पता करेंगे. गांव में एक-दो बुज़ुर्गों से पूछने पर पता चला कि मेरी मां के गांव का नाम ‘पाली’ है, जो लगभग 12-13 किलोमीटर की दूरी पर है.

जा पहुंचे ‘पाली’
हमारे सामने संकट ये था कि मां को जानने का कोई ओर-छोर हमारे पास नहीं था. मुझे तो मां का नाम तक नहीं पता था.

तंबी
अगले दिन सुबह हम दोनों ने घर से बाज़ार जाने की बात कही और बस पकड़ कर जा पहुंचे ‘पाली’.

हमारे सामने संकट ये था कि मां को जानने का कोई ओर-छोर हमारे पास नहीं था. मुझे तो मां का नाम तक नहीं पता था.

लकड़ियां ले कर आ रहे एक वृद्ध दंपत्ति को हमने रोका. हमने उनसे जानना चाहा कि लगभग 50 साल पहले इस गांव की कोई लड़की ब्याह कर तोंडंगकूर्ची गई थी क्या" border="0" alt="http://wscdn.bbc.co.uk/worldservice/assets/images/2010/07/26/100726081643_tambi_workplace_226x283_nocredit.jpg[/img]
[COLOR="Blue"][SIZE="3"]असल जिंदगी की कहानी पर तो कई फ़िल्में बनती हैं लेकिन फ़िल्मी सी लगने वाली कोई कहानी अगर ज़िंदगी में सच हो जाए तो क्या अनुभव होगा.

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में रहने वाले 50 वर्षीय राजेंद्र कुमार अय्यर ऊर्फ तंबी की जिंदगी किसी पटकथा से कम नहीं. 47 साल पुरानी एक धुंधली सी याद ने उन्हें किस तरह अपनों से जोड़ा, पेश है ये कहानी खुद ‘तंबी’ की ज़ुबानी.

"सच कहूं तो मुझे तो याद भी नहीं है लेकिन पिता ने बताया था कि जब मैं तीन साल का था तभी मेरे माता-पिता के बीच झगड़ा हुआ और मेरे पिता मुझे लेकर घर से निकल पड़े.

बचपन की याद

जब मैं तीन साल का था तभी मेरे माता-पिता के बीच झगड़ा हुआ और मेरे पिता मुझे लेकर घर से निकल पड़े.

राजेन्द्र कुमार अय्यर उर्फ 'तंबी'
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बचपन की मेरी पहली याद यही है कि मेरे पिता बिलासपुर शहर के एक छोटे से होटल में बरतन धो रहे हैं और मैं वहीं भट्टी के पास बैठा खेल रहा हूं. पिता दिन भर होटल में काम करते और रात में हम दोनों बाप-बेटे वहीं होटल के बरामदे में सो जाते.

पांच साल का होते-होते मैंने होटल में छोटे-छोटे काम करने शुरु कर दिये थे. तेज धार वाले चाकू से बारीक प्याज काटना तो मेरे लिये बायें हाथ का खेल था. होटल में मुझे सभी तंबी पुकारते थे. तंबी यानी ‘छोटा भाई’.

एक दिन मुझे इस तरह काम करते देख एक ग्राहक ने मेरे मालिक को टोका और कहा कि बच्चे को पढ़ने-लिखने दो. ग्राहक ने मेरे लिये दो ड्रेस सिलवाये और फिर मेरा पास के ही स्कूल में दाख़िला हो गया. स्कूल में मेरा नाम था राजेंद्र कुमार अय्यर.

मां का सपना

स्कूल मेरे लिये एक नया संसार था. नए दोस्त, नए लोग और पढ़ाई. हालांकि इससे मेरे जीवन में कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ा. सुबह सात से 11 तक स्कूल और फिर स्कूल से लौटते ही होटल का काम.

एक दिन पिता का होटल के मालिक से विवाद हो गया और उन्होंने दूसरी जगह काम करना शुरु कर दिया. लेकिन मैं वहीं बना रहा. परिस्थितियां ऐसी बनीं कि तीसरी कक्षा तक पढ़ाई के बाद स्कूल भी छूट गया और मैं एक बार फिर से बन गया केवल तंबी. मैं पूरी तरह से होटल के काम में ही रम गया.

एकाध बार मन में मां के बारे सवाल उठा. पिताजी से पूछा तो उन्होंने साफ कह दिया- ‘तुम्हारी मां तो कब की मर गई बेटा.

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अपनी पत्नी और बेटियों के साथ तंबी


तंबी
आठ साल की उम्र तक मैंने कई हुनर सीख लिए थे. मुझे पता था कि पकौड़ों और जलेबी से भरी 6-7 प्लेटों को किस तरह संभालना है. मुझे महीने के 15 रुपये भी मिलने शुरु हो गए थे. 14 साल का होते-होते होटल के मालिक ने मुझे होटल के रखरखाव से जुड़ा काम भी देना शुरु कर दिया. मेरे मालिक के पास लॉज थे, भोजनालय था और चाय-नाश्ता परोसने वाला ‘संतोष भुवन’. मैंने लगभग तीनों जगहों में मालिक का हाथ बंटाना शुरु कर दिया.

इस बीच पिताजी मेरे पास आते-जाते रहते थे. पिताजी के अलावा अपना कोई था भी कहां! भाई-बहन तो थे नहीं. एकाध बार मन में मां के बारे सवाल उठा. पिताजी से पूछा तो उन्होंने साफ कह दिया- ‘तुम्हारी मां तो कब की मर गई बेटा’.

ज़िंदगी होटल की रफ़्तार से ही चलती रही. दिन भर के काम के बाद जब रात को सोता तो कई बार सपने में लगता जैसे मेरी मां मुझे आवाज़ दे रही है, लेकिन ये शायद सिर्फ सपना ही था...."

असल जिंदगी की कहानी पर तो अकसर फिल्में बनती हैं लेकिन फिल्मी सी लगने वाली कोई कहानी अगर जिंदगी में सच हो जाए तो क्या अनुभव होगा.
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छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में रहने वाले 50 वर्षीय राजेंद्र कुमार अय्यर ऊर्फ तंबी की जिंदगी किसी पटकथा से कम नहीं. 47 साल पुरानी एक धुंधली सी याद ने उन्हें किस तरह अपनों से जोड़ा, ‘तंबी’ की इस कहानी को खुद उनकी ज़ुबानी हम आप तक पहुंचा रहे हैं.

क्लिक करें इससे पहले का विवरण पढ़ने के लिए क्लिक करें

(इस कहानी में अब तक आपने पढ़ा कि तीन साल की उम्र में तंबी के माता-पिता के बीच झगड़ा हुआ, और पिता उन्हें लेकर घर से निकल पड़े. अपने पिता के साथ मिलकर उन्होंने एक होटल में काम करना शुरु कर दिया. मां के बारे में पूछने पर उनसे कहा गया कि वो मर गई लेकिन तंबी अकसर उन्हें याद करते थे. अब आगे...)

'' मध्यप्रदेश के बिलासपुर शहर में रहते और काम करते मुझे 20 साल हो गए थे.

मैं कोई 25 साल का रहा होऊँगा. एक दिन पिताजी आए और उन्होंने अपने गांव की बात छेड़ी. ये 1985-86 के आसपास की बात है. तमिलनाडु के वृद्धाचलम के पास हमारा गांव था ‘तोंडंगकूर्ची’. बिलासपुर से कोई दो हज़ार किलोमीटर दूर.

एक दिन मैंने चाचा से अकेले में पूछा था- “ चाचा, मेरी मां कैसे मरी थी ” चाचा ने कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दिया. गांव में कुछ और लोगों से मैंने मां के बारे में जानना चाहा लेकिन कहीं कोई उत्तर नहीं मिला

तंबी
हम दोनों ने थोड़े से पैसे जमा किए और अपने गांव के लिये चल पड़े. पहले ट्रेन की लंबी यात्रा करके वृद्धाचलम. फिर वहां से वेपुर और वहां से बस पकड़ कर अपने गांव तोंडंगकूर्ची.

रिश्ते अनजाने

गांव में हम चाचा के घर रुके. पिता तो गांव में मगन हो गए लेकिन सच कहूं तो मेरे लिए रिश्ते के नाम पर कोई खास आकर्षण नहीं था. चाचा और चचेरे भाइयों के साथ रिश्ते की आत्मीयता तो थी लेकिन यह ये संबंध औपचारिक से ही थे. हो सकता है, पहली मुलाकात के कारण ऐसा हो. मैं पहली बार घर के माहौल से रूबरु हो रहा था.

कोई दस दिन तक वहां रहने के बाद हम दोनों बिलासपुर लौट आए. पिता खुश थे कि मैंने अपना गांव देख लिया और इतने सालों बाद उनकी भी अपने रिश्तेदारों से मुलाकात हो गई, लेकिन मेरा मन उदास था.

गांव में रहते हुये एक दिन मैंने चाचा से अकेले में पूछा था- “चाचा, मेरी मां कैसे मरी थी” चाचा ने कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दिया. गांव में कुछ और लोगों से मैंने मां के बारे में जानना चाहा लेकिन कहीं कोई उत्तर नहीं मिला.


अपनी पत्नी और बेटियों के साथ तंबी.
33 साल की उम्र में मेरी शादी हुई. इसके बाद दो बेटियां हुईं और मैं अपनी दुनिया में रम गया.

पिता की गांव वापसी

इस बीच पिताजी बीमार पड़ गए. उनका इलाज चलता रहा लेकिन एक दिन उन्होंने इच्छा जताई- “ मैं इस परदेस में रहकर नहीं मरना चाहता. मुझे गांव जाने दो.”

मेरे मना करने के बाद भी वो एक दिन मेरी जान-पहचान वाले से कुछ पैसे लेकर अकेले गांव चले गए. मेरे पास कोई चारा नहीं था. चाचा और चचेरे भाइयों को चिट्ठियां लिखी कि उनका ध्यान रखना. जितना संभव था, हर महीने उनके इलाज और दूसरे खर्चे के लिये मैंने मनीऑर्डर भेजना भी जारी रखा.

2007 में गांव से खबर आई कि पिताजी बहुत बीमार हैं, जल्दी आओ. भागा-भागा गांव पहुंचा. पिता बिस्तर पर थे. तय किया कि इन्हें बिलासपुर ले जाऊँगा. लेकिन इस बीच जो कुछ घटा, उसने मेरी दुनिया बदल दी.

चचेरे भाई की पत्नी से एक दिन दोपहर में यूं ही रिश्ते-नाते और मां को लेकर बात चली. भाभी से बातचीत में ही पता चला कि मेरी मां पिताजी से झगड़े के बाद अपने मायके चली गई थी. फिर उनका क्या हुआ, इसकी कोई खबर नहीं मिली. 48 साल की उम्र में एक बार फिर मेरे मन में मां के बारे में जानने की इच्छा जगी..."

"मैंने भाभी को इस बात के लिये तैयार किया कि हम दोनों मां के मायके जा कर इस बारे में पता करेंगे. गांव में एक-दो बुज़ुर्गों से पूछने पर पता चला कि मेरी मां के गांव का नाम ‘पाली’ है, जो लगभग 12-13 किलोमीटर की दूरी पर है.

जा पहुंचे ‘पाली’
हमारे सामने संकट ये था कि मां को जानने का कोई ओर-छोर हमारे पास नहीं था. मुझे तो मां का नाम तक नहीं पता था.

तंबी
अगले दिन सुबह हम दोनों ने घर से बाज़ार जाने की बात कही और बस पकड़ कर जा पहुंचे ‘पाली’.

हमारे सामने संकट ये था कि मां को जानने का कोई ओर-छोर हमारे पास नहीं था. मुझे तो मां का नाम तक नहीं पता था.

लकड़ियां ले कर आ रहे एक वृद्ध दंपत्ति को हमने रोका. हमने उनसे जानना चाहा कि लगभग 50 साल पहले इस गांव की कोई लड़की ब्याह कर तोंडंगकूर्ची गई थी क्या" />
पठानकोट में अपनी बहनों के साथ तंबी

मैं जल्दी से जल्दी अपनी मां से मिलने के लिए पठानकोट पहुंचना चाह रहा था. लेकिन यह सब कुछ इतना आसान नहीं था. पहले तो मेरी बेटी बीमार पड़ी और उसके बाद फिर पत्नी. मेरी कुल जमा पूंजी खत्म हो गई. हालत ये थी कि मेरे लिए घर चलाना मुश्किल हो गया था.

उधर मां और मेरे भाई-बहनों का फोन हर रोज आने लगा- “कब आ रहे हो’’.

मैं संकोच में किसी से कुछ कह नहीं पा रहा था. दिन-हफ्ते और महीने गुजरते रहे. एक दिन मुझे जानने वाले कुछ पत्रकारों को मैंने जब अपना किस्सा बताया तो उन्होंने उसी दिन मेरे लिये पैसे इकट्ठे किए और अगले दिन मैं ट्रेन में सवार हो कर पठानकोट के पास चक्की बैंक के लिये रवाना हो गया.

मैं अपनी मां और परिवार वालों से संपर्क में तो था ही. जब मैं चक्की बैंक स्टेशन पहुंचा तो दो नौजवान लड़कों ने आ कर मेरे पैर छुए. एक मेरा भतीजा था, दूसरा भांजा. मैंने पूछा कि मुझे पहचाना कैसे ? भांजे ने कहा- “आपकी शक्ल तो एकदम नानी से मिलती है.”
[COLOR="Read"][SIZE="4"]47 साल बाद मां से मुलाकात
:up:

http://wscdn.bbc.co.uk/worldservice/assets/images/2010/08/01/100801054207_tambi_with_mother_226x170_nocredit.jpg[/img]
47 साल बाद पहली बार तंबी अपनी मां से मिले.

मैं क्या कहता. मुझे तो अपनी मां की शक्ल भी याद नहीं थी.


स्टेशन पर मेरी बहन भी आई थी. हम सब मिल कर वहां रोते रहे.

घर पहुंच कर मैंने आवाज़ लगाई- अम्मा" border="0" alt="http://wscdn.bbc.co.uk/worldservice/assets/images/2010/08/01/100801054207_tambi_with_mother_226x170_nocredit.jpg[/img]
47 साल बाद पहली बार तंबी अपनी मां से मिले.

मैं क्या कहता. मुझे तो अपनी मां की शक्ल भी याद नहीं थी.


स्टेशन पर मेरी बहन भी आई थी. हम सब मिल कर वहां रोते रहे.

घर पहुंच कर मैंने आवाज़ लगाई- अम्मा" />
अपने नए पिता के साथ तंबी.


मैंने मां से विदा ली. भाई-बहनों से फिर मिलने का वादा किया और अपने को दिलासा देते हुए बिलासपुर लौट आया.

इन दिनों अपनी मां और भाई-बहनों से बात होती रहती है. सोचता हूं, अगली बार जब भी थोड़े पैसे इकट्ठे होंगे, अपनी पत्नी और दोनों बेटियों के साथ मां से मिलने जाउंगा.


http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2010/08/100801_tambi_lifestory4_pa.shtml

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"सत्य मेव जयते"
http://farm3.static.flickr.com/2344/4513019584_bbfa7c83fe_o.jpg" border="0" alt="http://farm3.static.flickr.com/2344/4513019584_bbfa7c83fe_o.jpg" />

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Last edited by: MGupta on 01-08-10 19:25:21
MGupta

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